वैज्ञानिक अध्यात्मवाद
मनुष्य उतना ही जानता है जितना कि उसे प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होता है । शेष सारा अदृश्य जगत का सूक्ष्म स्तरीय क्रियाकलाप जो इस सृष्टिमें हर पल घटित हो रहा है, उसकी उसे ग्रन्थों-महापुरुषों की अनुभूतियों-घटना प्रसंगों के माध्यम से जानकारी अवश्य है किन्तु उन्हें देखा हुआ न होने के कारण वह कहता यह पाया जाता है कि यह सब विज्ञान सम्मत नहीं है, अतः मात्र कोरी कल्पना है । विज्ञान की परिभाषा यदि सही अर्थों में समझ ली जाय तो धर्म, अध्यात्म को विज्ञान की एक उच्चस्तरीय उस विधा के रूप में माना जायगा जो दृश्य परिधि के बाद अनुभूति के स्तर पर आरम्भ होती है । इतना भार जान् लेने या हृदयंगम कर लेन पर वे सारे विरोधाभास मिट जायेंगे जो आज विज्ञान और अध्यात्म के बीच बताए जाते हैं । परमपूज्य गुरुदेव अपनी अनूठी निराली शैली में वाङ्मय के इस खण्ड में विज्ञान के विभिन्न पक्षों का विवेचन कर ब्राह्मी चेतना की व्याख्या तक पहुँचते हैं एवं तदुपरान्त इस सारी सृष्टि के खेल को उसी का क्रिया व्यापार प्रमाणित करके दिखा देते हैं । यही वाङ्मय के इस खण्ड का प्रतिपाद्य केन्द्र बिन्दु है ।
तत्त्व दृष्टिसे बंधन्मुक्ति कैसे हो, ''माया'' किसे हम मानें एवं जो प्रत्यक्ष दीख पड़ता है, वह भी सत्य है, यह कैसे जाने ? इन गुत्थियों का समाधान देते हुए परमपूज्य गुरुदेव लिखते हैं कि यदि आज की मूढ़ मान्यताओं तथाकथित अंधविश्वासों, प्रथा-परम्पराओं, कुहासे में घिरे धर्म को विज्ञान का पुट देकर स्वच्छ छवि दी जा सके एवं स्थान-स्थान पर जहाँ तक विज्ञान व धर्म की व्याख्या साथ-साथ की जा सकनी सम्भव है, करते हुए दोनों को सहगामी बनाया जा सके, तो जो भी कुछ आज अज्ञान के रूप हमे समक्ष विज्ञान के ढकोसले में दिखाई देता है, वह स्पष्ट समझ में आने लगेगा । वैज्ञानिकों के ही तर्को, तथ्यों, प्रमाणों की साक्षी देकर परमपूज्य गुरुदेव यह सिद्ध कर देते हैं कि विज्ञान पर यदि अध्यात्म रूपी सम्वेदना के समुच्चय तत्त्वज्ञान की जब तक नकेल नहीं कसी जायेगी, वह स्वच्छन्द हो भस्मासुर की तरह घातक बनता चला जाएगा । एवं यह गलत भी नहीं है । क्योंकि ऐसा होता हुआ हम दैनन्दिन जीवन में प्रति पल देख रहे हैं ।
Sunday, February 21, 2010
संस्कृति का स्वरूप

संस्कृति का स्वरूप
विश्व की सर्वोत्कृष्टि संस्कृति भारतीय संस्कृति है, यह कोई गर्वोक्ति नहीं अपितु वास्तविकता है । भारतीय संस्कृति को देव संस्कृति कहकर सम्मानित किया गया है । आज जब पूरी संस्कृति पर पाश्चात्य सभ्यता का तेजी से आक्रमण हो रहा है, यह और भी अनिवार्य हो जाता है कि, उसके हर पहलू को जो विज्ञान सम्मत भी है तथा हमारे दैनन्दिन जीवन पर प्रभाव डालने वाला भी, हम जनजन के समक्ष प्रस्तुत करें ताकि हमारी धरोहर-आर्य संस्काति के आधार भूत तत्व नष्ट न होने पायें ।
भारतीय संस्कृति का विश्व संस्कृति परक स्वरूप तथा उसकी गौरव गरिमा का वर्णन तो इस वाङ्मय के पैंतीसवें खण्ड 'समस्त विश्व को भारत के अजस्र अनुदान' में किया गया है किंतु इस खण्ड में संस्कृति के स्वरूप, मान्यताएँ, कर्म काण्ड-परम्पराएँ-उपासना पद्धतियाँ एवं अंत में इसके सामाजिक पक्ष पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है । इस प्रकार दोनों खण्ड मिलकर एक दूसरे के पूरक बनते हैं ।
भारतीय संस्कृति हमारी मानव जाति के विकास का उच्चतम स्तर कही जा सकती है । इसी की परिधि में सारे विश्वराष्ट के विकास के-वसुधैव कुटुम्बकम् के सारे सूत्र आ जाते हैं । हमारी संस्कृति में जन्म के पूर्व से मृत्यु के पश्चात् तक मानवी चेतना को संस्कारित करने का क्रम निर्धारित है । मनुष्य में पशुता के संस्कार उभरने न पायँ, यह इसका एक महत्त्वपूर्ण दायित्व है । भारतीय संस्कृति मानव के विकास का आध्यात्मिक आधार बनाती है और मनुष्य में संत, सुधारक, शहीद की मनोभूमि विकसित कर उसे मनीषी, ऋषि, महामानव, देवदूत स्तर तक विकसित करने की जिम्मेदारी भी अपने कंधों पर लेती है । सदा से ही भारतीय संस्कृति महापुरुषों को जन्म देती आयी है व यही हमारी सबसे
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