महापुरुषों का कथन है कि बालक की नैतिक शिक्षा उसके जन्म से पूर्व ही आरम्भ हो जाती है । अतः अपनी सन्तान को सच्चरित्र बनाने की अभिलाषा रखने वाले माता-पिता का यह कर्त्तव्य है कि वे बालक के जन्म से ही उन गुणों को स्वयं प्राप्त करने का प्रयत्न करें, जिन गुणों को वे अपनी सन्तान में होना आवश्यक समझते हैं । फिर भी जिन बालकों के माता-पिता ने इस ओर उचित ध्यान नहीं दिया, उनकी प्रवृत्तियों का भी अच्छी परिस्थिति की सहायता से बहुत कुछ सुधार किया जा सकता है । भले साथियों के सहवास से बुरी प्रवृत्तियों का दमन तथा अच्छी प्रवृत्तियों को उत्तेजित किया जा सकता है ।
वंश परम्परा तथा कुसंगति द्वारा प्राप्त कुप्रवृत्तियों का पारिवारिक सुधार कुछ अंशों में सदाचार शिक्षा द्वारा हो सकता है, परन्तु इस प्रकार की शिक्षा देने में निम्नलिखित छः बातों की ओर ध्यान देना आवश्यक है-
(१) कुछ सीमा के अन्दर बालकों को थोड़ी-बहुत स्वतंत्रता अवश्यमेव देनी चाहिए । उनकी प्रवृत्तियों का व्यर्थ दमन करने तथा हर समय उनको सख्त कैद में रखने से बहुत हानि की आश्शंका रहती है । इस प्रकार बालक डरपोक बन जाते हैं और उनमें आत्मविश्वास, स्वावलम्बन, दृढ़ निश्चय, उद्योगशीलता तथा मौलिकता आदि गुणों का विकास नहीं होने पाता । अतः बालकों को स्वतन्त्र रीति से कार्य करने का अधिक से अधिक अवसर देना चाहिए, जिससे कि उनके व्यक्तित्व और चरित्र का उचित रूप से विकास हो सके ।