चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि से नववर्ष का शुभारंभ हो जाता है। और नववर्ष के प्रारंभ के साथ ही शुरुआत हो जाती है वसंतकालीन नवरात्र महोत्सव की। पितृपक्ष या श्राद्ध की समाप्ति हो और चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की समाप्ति के साथ ही परिवेश में एक परिवर्तन आने लगता है। इस परिवर्तन के कई स्तर और स्वरूप हैं। पहला परिवर्तन है ऋतु परिवर्तन। नवरात्रों का आयोजन वर्ष में दो बार किया जाता है। एक है वसंतकालीन नवरात्र तथा दूसरा है शरदकालीन नवरात्र। वसंत और शरद दोनों ऋतुएं परिवर्तन की सूचक हैं। ऋतुओं के संधिकाल में नवरात्रों का आयोजन वास्तव में मनुष्य के बाह्य और आतरिक परिवर्तन में संतुलन स्थापित करना है। इस आयोजन का उद्देश्य ही मनुष्य के अंतर्जगत में सही परिवर्तन कर उसे बाह्य परिवर्तन के अनुकूल बनाकर संतुलन प्रदान करना है।
यह तथ्य अत्यंत महत्वपूर्ण है कि मनुष्य के लिए बाह्य परिवर्तन को स्वीकार करना अनिवार्य है। यदि मनुष्य बदलते परिवेश अथवा परिवर्तन को स्वीकार नहीं करेगा तो उसका अस्तित्व ही संकट में पड़ जाएगा। बाह्य परिवर्तन को स्वीकार करने के लिए आतरिक परिवर्तन अनिवार्य है। नवरात्रों के दौरान किए जाने वाले अनुष्ठान व्रत तथा पूजा-अर्चना आदि पर्यावरण की शुद्धि के साथ-साथ मनुष्य की शरीर शुद्धि और भाव शुद्धि में भी सक्षम हैं। नवरात्रों के दौरान व्रत का उद्देश्य शरीर की शुद्धि करे। शरीर की शुद्धि के बिना मन की शुद्धि अर्थात् भाव शुद्धि संभव नहीं है। नवरात्रों के दौरान सभी प्रकार के अनुष्ठान शरीर और मन की शुद्धि में सहायक होते हैं। नवरात्रों का आयोजन शुक्ल पक्ष में ही किया जाता है। वसंतकालीन नवरात्र चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि से प्रारंभ होते हैं तो शरद्कालीन नवरात्र आश्रि्वन मास की शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि से। प्रत्येक मास में दो पक्ष होते हैं कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष। कृष्ण पक्ष बढ़ते अंधकार और अज्ञान का प्रतीक है तो शुक्ल पक्ष घटते अंधकार और अज्ञान का प्रतीक।
शुक्ल पक्ष में नवरात्रों का आयोजन इस तथ्य का प्रतीक है कि हम निरंतर असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर तथा मृत्यु से अमरता की ओर अग्रसर हों। अपने मनोभावों को सकारात्मकता प्रदान करें क्योंकि सकारात्मकता के अभाव में असत्य, तमस और मृत्यु से पार पाना असंभव है। नवरात्र नकारात्मकता पर सकारात्मकता की जीत का अवसर प्रदान करने में सक्षम हैं। नवरात्रों के आयोजन का एक और पक्ष भी है। इन दिनों दुर्गा के विभिन्न नौ रूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। दुर्गा के ये रूप वस्तुत: मनुष्य की विभिन्न मनोदशाओं के परिष्कार से जुड़े हैं। दुर्गा के विभिन्न रूप विभिन्न राक्षसों के संहार से जुड़े हैं। ये राक्षस वास्तव में मनुष्य की नकारात्मक घातक प्रवत्तियों के प्रतीक हैं। राक्षसों का संहार करने वाली देवी की पूजा-अर्चना का अर्थ है आसुरी वृत्तियों अर्थात् मन से नकारात्मक घातक भावों का उन्मूलन। यदि हम ऐसा नहीं कर पाते तो नवरात्रों का आयोजन सार्थक नहीं कहा जा सकता।
जीवन में सुख और दुख दोनों साथ-साथ चलते हैं। वास्तव में सुख की अनुभूति के लिए अनिवार्य है दुख का आस्वादन भी। यही स्थिति मौसम और ऋतुओं की भी है। कड़ी ठंड के बाद गर्मी और गर्मी के बाद कड़ी ठंड। दिन के बाद रात और रात के उपरात दिन। यदि हम ध्यानपूर्वक देखें तो पाते हैं कि विषम प्रतिकूल मौसम या अवस्था के बाद एक सुहावना मौसम भी अवश्य आता है। सर्दी के बाद वसंत तो गर्मी के बाद वर्षा तथा शरद ऋतु। ये गर्मी-सर्दी जहां प्रतिकूल परिस्थितियों का प्रतीक हैं, वहीं वसंत-शरद ऋतुएं अनुकूल परिस्थितियों का। सुख के बाद दुख तथा दुख के बाद सुख का आगमन अपरिहार्य है। सुख स्थायी नहीं है तो दुख भी स्थायी नहीं है। यदि हम इस तथ्य को जान लें तो जीवन सरल हो जाए। निराशा से बच जाएंगे। इसी से आशावादिता का विकास भी संभव है जो एक सकारात्मक वृत्ति है। इस प्रकार नवरात्रों का आयोजन आध्यात्मिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है जो जीवन में समता का भाव उत्पन्न करने में सहायक है।
नवरात्रों का आयोजन धूम-धाम से किया जाता है। यह हमें आनंदानुभूति प्रदान करता है। आनंद की अवस्था मनुष्य के लिए सबसे अच्छी अवस्था है। आनंद की अवस्था में हमारे शरीर में जो हार्मोन उत्सर्जित होते हैं वे हमें व्याधियों से तो बचाते ही हैं साथ ही रोग होने की दशा में शीघ्र रोगमुक्ति प्रदान करने में भी सहायक होते हैं। इस प्रकार अन्य उत्सवों और आयोजनों की तरह ही नवारात्रों के आयोजन का सीधा संबंध हमारे अच्छे स्वास्थ्य और रोगमुक्ति से भी है।