Tuesday, July 5, 2011

"आपके पास देने को बहुत है


"आपके पास देने को बहुत है .
"
नहीं साहब, पैसा हमारे पास कम है", 
तो पैसा कौन मांग रहा है आपसे ? और पैसा देकर के आप क्या भला करेंगे आदमी का ?
आप दूसरों को प्यार दीजिए न !
आप दूसरों को सम्मान दीजिए न ! 
फिर देखिये कि सम्मान की दुनिया कितनी प्यासी है !
आप लोगों को प्रोत्साहन दीजिए न !
देखिये, आपके प्रोत्साहन से छोटे-छोटे आदमी क्या से क्या बन सकते हैं !
देने के लिए कुछ कम है क्या ?
आप मेहनत दे दीजिए, आप लोगों के लिए सहानुभूति दे दीजिए .
देने के लिए कुछ भी कम नहीं है ! आपके पास देने की अगर मनोवृत्ति हो, 
तो आप कुछ भी दे सकते हैं !
आप चार रोटी खाते हैं, तीन रोटी खाइए, एक रोटी बचा दीजिए गरीबों के लिए ! 
फिर आप देखेंगे किस तरीके से आपको शान्ति मिलती है, और किस तरीके से आप प्रसन्नता के नज़दीक चले जाते हैं . 
भगवान का नाम प्यार है ! 
प्यार आप भीतर पैदा कीजिये न !
जिस दिन आप प्यार पैदा करेंगे, उस दिन आपके मन में से एक ही उमंग 
और ऐसी हिलोर उत्पन्न करेगी कि हमको कैसे दूसरों की सहायता करनी है ! "

-
युग ऋषि श्रीराम शर्मा आचार्य
(
अमृतवाणी-"जीवन कैसे जियें ")

Saturday, April 30, 2011

दुष्कर्मों के दण्ड से प्रायश्चित्त ही छुड़ा सकेगा


 
यह ठीक है कि जिस व्यक्ति के साथ अनाचार बरता गया अब उस घटना को बिना हुई नहीं बनाया जा सकता । सम्भव है कि वह व्यक्ति अन्यत्र चला गया हो । ऐसी दशा में उसी आहत व्यक्ति की उसी रूप में क्षति पूर्ति करना सम्भव नहीं । किन्तु दूसरा मार्ग खुला है । हर व्यक्ति समाज का अंग है । व्यक्ति को पहुँचाई गई क्षति वस्तुतप्रकारान्तर से समाज की ही क्षति है । उस व्यक्ति को हमने दुष्कर्मों से जितनी क्षति पहुँचाई है उसकी पूर्ति तभी होगी जब हम उतने ही वजन के सत्कर्म करके समाज को लाभ पहुँचाये । समाज को इस प्रकार हानि और लाभ का बैलेन्स जब बराबर हो जायेगा तभी यह कहा जायेगा कि पाप का प्रायश्चित हो गया और आत्मग्लानि एवं आत्मप्रताडऩा से छुटकारा पाने की स्थिति बन गई । 
सस्ते मूल्य के कर्मकाण्ड करके पापों के फल से छुटकारा पा सकना सर्वथा असम्भव है । स्वाध्यायसत्संगकथाकीर्तनतीर्थव्रत आदि से चित्त में शुद्धता की वृद्धि होना और भविष्य में पाप वृत्तियों पर अंकुश लगाने की बात समझ में आती है । धर्म कृत्यों से पाप नाश के जो माहात्मय शास्त्रों में बताये गये हैं उनका तात्पर्य इतना ही है कि मनोभूमि का शोधन होने से भविष्य में बन सकने वाले पापों की सम्भावना का नाश हो जाये । 
ईश्वरीय कठोर न्याय व्यवस्था में ऐसा ही विधान है कि पाप परिणामों की आग में जल मरने से जिन्हें बचना हो वे समाज की उत्कृष्टता बढ़ाने की सेवा-साधना में संलग्न हों और लदे हुए भार से छुटकारा प्राप्त कर शान्ति एवं पवित्रता की स्थिति उपलब्ध कर लें ।
युग निर्माण योजना दर्शनस्वरूप व कार्यक्रम-६६ (.१८)

Thursday, April 21, 2011

ज्ञान-यज्ञ इस युग का महानतम अभियान


मनुष्य की मूल शक्ति विचारणा है । उसी के आधार पर इतनी प्रगति कर सकना उसके लिए सम्भव हुआ है । समस्याएँ विचारों की विकृति से उत्पन्न होती हैं और उनका समाधान दृष्टिकोण बदलने से निकलता है । सचमुच जो जैसा सोचता हैवह वैसा ही बनकर रहता है । सोचने की दिशा में ही क्रिया बनती है और उसी की परिणति परिस्थितियों के रूप में सामने आती है । परिस्थितियों का अपने आप में कोई स्वतंत्र आधार नहीं है । वे हमारे कर्तृत्‍व का परिणाम मात्र हैं । इसी प्रकार कर्तृत्‍व भी अपने आप नहीं बन जाता हैविचारों की प्रेरणा ही हमारी कार्य पद्धति के लिये पूरी तरह उत्तरदायी होती है । इस तथ्य को समझ लेने पर ही आज की मानवीय समस्याओं का कारण और निवारण ठीक तरह समझा
 जा सकता है ।
खेद है कि अब तक इस प्रकार का चिन्तन नहीं के बराबर हुआ है जो हुआ है उसको महत्त्व नहीं दिया गया । हमारे मूर्धन्य व्यक्ति इतना भर सोचते रहे है कि शासनतंत्र के माध्यम से सुविधा-साधन बढ़ा देने से मनुष्य सुखी रहने लगेगा और अपनी उलझनें सुलझा लेगा । पर देखते है कि वह मान्यताएँ गलत सिद्ध होती चली जा रही हैं । शासन तंत्र को सुधारने के लिये जितने हाथ-पैर पीटे जाते हैं उतनी ही उससे विकृतियॉं उत्पन्न होती चली जा रही हैं । अर्थ-तंत्र से नि:संन्देह कई प्रकार की सुविधाएँ उत्पन्न की हैं पर परिणाम उलटा ही रहा है । तथाकथित प्रगति की जड़ें बिलकुल खोखली हैंकिसी भी धक्के में वह लडख़ड़ा सकती है । स्थायी प्रगति और सुदृढ़ समर्थता के लिए चरित्र बल होना चाहिए और वह उत्कृष्ट विचारणा की भूमि पर ही उग सकता है ।
ज्ञान-यज्ञ देखने-सुनने में छोटी बात लगती हैपर उसकी सम्भावनाएँ उतनी विशाल हैं कि यदि ठीक तरह इस अभियान को चलाया जा सका तो विश्वास है कि लोक-मानस में विवेकशीलता और सत्प्रवृत्तियों की गहरी स्थापना सम्भव हो सकेगी और नये युग के अवतरण का स्वप्न साकार किया जा सकेगा ।

युग निर्माण योजना दर्शनस्वरूप व कार्यक्रम-66 (4.46)

Tuesday, April 19, 2011

सजीव प्रचारक


बुरे आदमी बुराई के सक्रिय सजीव प्रचारक होते हैं । वे अपने आचरणों द्वारा बुराईयों की शिक्षा लोगों को देते हैं । उनकी कथनी और करनी एक होती है। जहाँ भी ऐसा सामंजस्य होगा उसका प्रभाव अवश्य पड़ेगा । कुछ लोग धर्म-प्रचार का कार्य करते हैं पर वह सब कहने भर की बातें होती हैं । इन प्रचारकों की कथनी और करनी में अन्तर रहता है । यह अन्तर जहाँ भी रहेगा वहाँ प्रभाव क्षणिक ही रहेगा । सच्चे धर्म प्रचारक जिनकी कथनी और करनी एक रही है अपने अगणित अनुयायी बनाने में समर्थ हुए हैं । बुद्धगाँधीतिलककबीरनानक आदि की कथनी और करनी एक थीवे अपने आदर्शों के प्रति सच्चे थेइसलिए अगणित व्यक्ति उनका अनुकरण करने वालेउनके आदर्शों पर बड़े से बड़ा त्याग करने वालेप्रस्तुत हो गये थे । 
आज अच्छाइयों एवं आदर्शों के सच्चे एवं सजीव प्रचारक नहीं हैं और बुराइयों के सजीव आस्थावान प्रचारक हर जगह मौजूद हैंवे बुरे काम करते हैंबुराइयाँ सिखाते हैंपर ऐसे धर्म प्रचारक कहाँ हैं जो अपने आचरणों से दूसरों को शिक्षा और प्रेरणा प्रदान करें । जहाँ थोड़े बहुत सच्‍चे लोग हैं वहाँ प्रभाव भी पड़ रहा है । हजारों मील से आकर विदेशी ईसाई मिशनरी भारत में ईसाई धर्म का प्रचार पूरी आस्‍था और लगन के सा‍थ कर रहें हैं फलस्‍वरूप गत वर्षों में ही लाखों की संख्‍या में लोगों ने हिन्‍दु धर्म का परित्‍याग कर ईसाई धर्म की दीक्षा ली ।

युग निर्माण योजना दर्शनस्वरूप व कार्यक्रम-६६ (.)
 

Friday, April 15, 2011

चोरी के अन्न ने चोर बनाया


एक बार एक बड़े त्यागी महात्मा कहीं धर्मोपदेश करने  गए और वहां से एक सोने का हार चुरा लाये ! 
तीसरे दिन वे बड़े दु:खी मन से वहां पहुंचे और हार लौटाते हुवे क्षमा मांगी ! 
गृहस्थ को बड़ा आश्चर्य हुवा की इतने त्यागी और विद्वान् होते हुवे भी
 क्यों इन्होने हार चुराया और क्यों लौटाने आये ?
          महात्माजी ने बताया कि उस दिन उनने जिस व्यक्ति के यहाँ से भिक्षा ली थी वह चोर था , 
उसका अन्न भी चोरी से लाया हुवा था ! उसे खाने से मेरी बुधि में चोरी के संस्कार पैदा हुवे ! 
इसके बाद दस्त शुरू हो गए  और अन्न पेट से निकल गया ! तब सु बुध्ही  लौटी, आपके हार को लौटाने को आया !
जिव्हा वाणी कि भी भूमिका संपन्न करती है ! 
वाणी का स्तर ही मनुष्य के गुण , कर्म , स्वभाव का परिचायक होता है ! 
वाणी सुसंस्कृत हो तो  जीवन देवता का श्रृंगार कर देती है !