Friday, April 15, 2011

चोरी के अन्न ने चोर बनाया


एक बार एक बड़े त्यागी महात्मा कहीं धर्मोपदेश करने  गए और वहां से एक सोने का हार चुरा लाये ! 
तीसरे दिन वे बड़े दु:खी मन से वहां पहुंचे और हार लौटाते हुवे क्षमा मांगी ! 
गृहस्थ को बड़ा आश्चर्य हुवा की इतने त्यागी और विद्वान् होते हुवे भी
 क्यों इन्होने हार चुराया और क्यों लौटाने आये ?
          महात्माजी ने बताया कि उस दिन उनने जिस व्यक्ति के यहाँ से भिक्षा ली थी वह चोर था , 
उसका अन्न भी चोरी से लाया हुवा था ! उसे खाने से मेरी बुधि में चोरी के संस्कार पैदा हुवे ! 
इसके बाद दस्त शुरू हो गए  और अन्न पेट से निकल गया ! तब सु बुध्ही  लौटी, आपके हार को लौटाने को आया !
जिव्हा वाणी कि भी भूमिका संपन्न करती है ! 
वाणी का स्तर ही मनुष्य के गुण , कर्म , स्वभाव का परिचायक होता है ! 
वाणी सुसंस्कृत हो तो  जीवन देवता का श्रृंगार कर देती है !