एक बार एक बड़े त्यागी महात्मा कहीं धर्मोपदेश करने गए और वहां से एक सोने का हार चुरा लाये !
तीसरे दिन वे बड़े दु:खी मन से वहां पहुंचे और हार लौटाते हुवे क्षमा मांगी !
गृहस्थ को बड़ा आश्चर्य हुवा की इतने त्यागी और विद्वान् होते हुवे भी
क्यों इन्होने हार चुराया और क्यों लौटाने आये ?
महात्माजी ने बताया कि उस दिन उनने जिस व्यक्ति के यहाँ से भिक्षा ली थी वह चोर था ,
उसका अन्न भी चोरी से लाया हुवा था ! उसे खाने से मेरी बुधि में चोरी के संस्कार पैदा हुवे !
इसके बाद दस्त शुरू हो गए और अन्न पेट से निकल गया ! तब सु बुध्ही लौटी, आपके हार को लौटाने को आया !
जिव्हा वाणी कि भी भूमिका संपन्न करती है !
वाणी का स्तर ही मनुष्य के गुण , कर्म , स्वभाव का परिचायक होता है !
वाणी सुसंस्कृत हो तो जीवन देवता का श्रृंगार कर देती है !
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