Monday, February 22, 2010

स्वावलम्बन ही देगा आर्थिक सशक्तता

स्वावलम्बन ही देगा आर्थिक सशक्तता

हमारा देश कृषि प्रधान है, पर योजनाबद्ध ढंग से यहाँ की कृषि को क्रमशः समाप्त किया जा रहा है । स्पेशल इकॉनामिक जोन (एस.ई.जेड) बनते चले जा रहे हैं, जिनसे कृषि सिमटकर कुछ हाथों में आ रही है । उत्पादित अन्न की कीमत न मिलने के कारण कृषक भी अब वैकल्पिक रूप में अन्य प्रोफेशन अपना रहे हैं । जमीन की कीमत करोड़ों रुपये हो जाने एवं बहुराष्ट्रीय कंपनियों-भूनिर्माताओं द्वारा खरीद लिये जाने के कारण स्वावलम्बन का माद्दा ही समाप्त होता जा रहा है । एक आर्थिक विषमता सी आती जा रही है । जब घर की व्यवस्था के मूल आधार अपनी माँ-भूमि को ही बेच दिया, तो आया धन दुर्व्यसनों में समाप्त हो जाएगा एवं पास में कर्जे एवं खाली समय के अलावा कुछ नहीं बचेगा । रासायनिक खादों की प्रचुरता से भूमि बंजर हो रही है और उत्पादन समुचित न होने के कारण कर्जों में बंधे किसान आत्महत्या कर रहे हैं । कुल मिलाकर स्थिति बड़ी विद्रूप सी है ।

कृषि-बागवानी आधारित स्वावलम्बन, छोटे-छोटे गृह उद्योग-गोमाता पर आधारित स्वावलम्बन-रोजमर्रा के जीवन में काम आने वाली वस्तुओं के उत्पादन हेतु छोटी-छोटी ईकाइयों की स्थापना ही अब ऐसे आधार बन सकती हैं, जिनसे हम आर्थिक क्रांति को जन्म दे सकें । ऐसे मिशनरी कामर्शियल प्रोडक्ट्स के निर्माण का तंत्र भारत व्यापी बनाना होगा । उनकी खपत का एक पूरा बाजार उपलब्ध है । हमें उस बाजारवाद से संघर्ष करना है, जो बहुराष्ट्रीयकरण-भू-मण्डलीकरण के नाम पर एक दूसरी आर्थिक गुलामी का चोगा पहनाने हमारे देश में प्रवेश कर चुका है । योग व आयुर्वेद से जुड़ी ढेरों वस्तुएँ ग्रामीण स्वावलम्बन से विनिर्मित हो सकती हैं एवं इस प्रकार स्वावलम्बन-स्वास्थ्य की क्रांतियाँ साथ-साथ चल सकती हैं ।

युवाशक्ति आगे आये
जरूरत है, ऐसे नवयुकों की-अग्रणी नेतृत्व कर सकने वाली युवतियों की, जो अपने समूहों का-मण्डलों का निर्माण करें और वह चाहे कचरे से खाद का निर्माण हो, गोबर-गोमूत्र से खाद व कीटनाशक का निर्माण हो अथवा नेडप-वर्मी कम्पोस्ट तथा छोटे-छोटे लगभग डेढ़ सौ प्रकार के ग्रामीण उद्योगों का विकास-विस्तार हो, उसे साकार करने हेतु आगे आएँ । उनके लिए आर्थिक आधार-पूँजी जुटाने का पूरा तंत्र विकसित किया जायेगा । देव संस्कृति विश्वविद्यालय का ग्राम प्रबंधन विभाग एवं शान्तिकुञ्ज का जोनल संगठन उनका भलीभाँति मार्गदर्शन भी करेगा । एक बार मॉडल बन गया, तो उसे फिर कई स्थानों पर दुहराया जा सकता है ।

शापिंग माल-प्लाजा की संस्कृति एवं चीन से आने वाले सस्ते माल ने हम सभी के समक्ष एक जबर्दस्त चुनौती प्रस्तुत कर दी है, परंतु सहकारिता के आधार पर मानकीकरण के साथ किये गये इन देशी प्रयोगों में जान है । इससे हमारी कृषि की भी रक्षा होगी । उत्पादों में प्राणतत्व भी रहेगा । डोर टू डोर जाकर बिक्री का तंत्र चल पड़ने पर एक नया बाजार उपलब्ध हो सकेगा । संभावनाएँ अनंत हैं । सोच विकसित की जा सके, तो आगामी चार वर्षों में हम इसका एक पूरा नेट वर्क तैयार कर आधुनिक उपकरणों-कम्प्यूटर्स-इंटरनेट द्वारा समुचित प्रचार भी कर सकते हैं तथा लोगों में स्वदेशी-स्वावलम्बन का आकर्षण जगा सकते हैं ।


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