कामनाओं को साथ लेकर परमात्मा की पूजा प्राथना करने वाला वास्तव में परमात्मा की नहीं अपनी कामनाओं की ही उपासना किया करता है ! उसमे जो कुछ लगन,तीव्रता और तन्मयता होती है,उसके कामनाओं की लिप्सा ही हुवा करती है,प्रभु प्रेम नहीं!तब भला ऐसा वंचक उस विज्ञानमय प्रभु को किस प्रकार प्रसन्न कर सकता है ??
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