
परिष्कृत जीवन को परिपुष्ट जीवन कह सकते हैं और पूजा-पाठ को श्रंगार । स्वस्थता के रहते यदि श्रंगार भी सजा लिया जाए तो हर्ज नहीं, पर अकेले श्रंगार सज्जा बनाकर कोई कृषकाय, जराजीर्ण और रोगग्रस्त मात्र उपहासास्पद ही बन सकता है । इन दिनों तो लोग श्रंगार को ही सब कुछ मान बैठे हैं, स्वस्थता की आवश्यकता नहीं समझते और मंत्र-तंत्र का कर्मकांड पूरा करके ही बड़ी-बड़ी आशा-अपेक्षा करने लगते हैं । मान्यता में बेतुकापन रहने से जब कुछ प्रयोजन सिद्ध नहीं होता तो नास्तिकों जैसी मान्यता बनाने या चर्चा करने लगते हैं ।
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