Thursday, March 4, 2010

अवसर का विवेचन

सुखी चट्टान पर लगातार पानी के गिरने पर भी एक तिनका नहीं उगता ! अंधे को मनोरम द्रश्य कभी नहीं दिखते! बहरा मधुर संगीत तक नहीं सुन
पाता! पागल के लिए सारा संसार पागल है ! दरवाजे बंद हों, तो कमरे में न रोशनी पहुँच सकती है,न धुप ! औंधे मुहँ पड़े हुए घड़े पर से पूरी
बरसात निकल जाने पर भी उसमे एक बूंद पानी नहीं घुसता , जबकि उन दिनों सभी जलाशय अपनी गहराई के अनुरूप जल - सम्पदा जमा
कर लेते हैं !
इसी तरह अवतार चेतना प्रवाहित सब जगह होती है ! जिनके अन्दर जाग्रति होती है ,वे उसे पहचान लेते हैं , उसके लिए आगे आते हैं और लाभ
उठाते हैं !

पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

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